मध्यप्रदेश मे मराठो का विस्तार एवं आधनिक इतिहास
मध्यप्रदेश में मराठों का उत्कर्ष एवं प्रमुख घटना क्रम
- 1688 से 1700 ईसवी के बीच छत्रपति राजाराम के समकालीन मराठी सेना बरार, खानदेश और नर्मदा को पार कर चुकी थी
- लॉर्ड हेस्टिंगटन के समय में सर जॉन माल कम 1817 से 1818 के बीच पेशवा और विभिन्न रियासतों के बीच संध्या करा रहे थे उन्होंने लिखा की मराठों की अलग-अलग सैनिक दल 1690 से 1694 के बीच मालवा क्षेत्र पर घुसपैठ कर चुकी थी
- 1701 से 1702 के बीच निभाजी शिंदे और उनकी सेना नर्मदा पार करके मालवा में प्रवेश करती है
- 1703 में बरार का गवर्नर गाजी उद्दीन खान फिरोज जंग में नेभा जी शिंदे का पीछा किया और उन दोनों की भिड़ंत सिरोंज में हुई थी
- शाहजाद बेदर बख्त को 3 अगस्त 1704 में मालवा का मुगल गवर्नर बनाया गया थादिल्ली के मुगल बादशाह के द्वारा गिरधर बहादुर को 1722 में मालवा का सूबेदार नियुक्त किया गया था
- बाजीराव ने होशंगाबाद के मार्ग का इस्तेमाल करके 25 फरवरी 1723 को मालवा अभियान का संचालन किया था और 15 मई 1723 को भोपाल के नवाब दोस्त मोहम्मद को पराजित किया था
- अमझेरा के युद्ध में गिरधर बहादुर और दयाराम बहादुर मारे गए थे या युद्ध 29 नंबर 1728 को हुआ था इसके पहले गिरधर बहादुर को दोबारा मालवा का सूबेदार नियुक्त किया गया था जून 1725 में
- दिल्ली के मुगल बादशाह ने नवंबर 1729 में सवाई जय सिंह को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया था सवाई जयसिंह इस पद में सितंबर उन 1730 तक रहे।
- मराठों के दल के नेता मल्हार राव होलकर और उदाजी पवार मैं मांडू दुर्ग पर अधिकार कर लिया यह अधिकार नवंबर 1729 किया गया था लेकिन मालवा के सूबेदार सवाई जयसिंह के आग्रह में तथा छत्रपति साहू जी के आदेश पर इस दुर्ग को खाली कर दिया गया था
- सवाई जय सिंह को अक्टूबर 1732 में दोबारा मालवा का सूबेदार बनाया गया
- 1732 से 1736 के मध्य मध्यप्रदेश में मुगल प्रशासन को धूल चाटने पड़ी थी और मध्य प्रदेश लगभग पूर्ण रूप से मुगलों के हाथ से निकल कर मराठों के हाथ में आ गया था।
- मल्हार जी होलकर रानोजी शिंदे, पिलाजी जाधव मालवा में नवंबर 1733 में प्रवेश किया था।
- मध्यप्रदेश में 1732 में मालवा में स्थापित हुए पांच राज्य,
- होलकर राजवंश के द्वारा स्थापित इंदौर राज्य,
- सिंधिया राजवंश के द्वारा स्थापित ग्वालियर राज्य,
- आनंद राव पवार वंश के द्वारा स्थापित धार राज्य,
- तुकोजी वंश के द्वारा स्थापित देवास की बड़ी पांती राज्य
- जीवाजी वंश के द्वारा स्थापित देवास की छोटी पांती राज्य
बुंदेलखंड में बाजीराव प्रथम का आगमन
- चंपत राय ने विंध्य प्रदेश में औरंगजेब के दमनकारी नीतियां, जबरन धर्म परिवर्तन एवं हत्याओं के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया था।
- चंपत राय के बाद उनके पुत्र छत्रसाल ने इस संघर्ष को आगे बढ़ाया उन्होंने विंध्य प्रदेश और उत्तरी मध्य भारत के कई क्षेत्र जैसे महाकौशल के सागर आदि को जीत लिया था।
- मोहम्मद खान बंगस ने 1728 में चलाए गए एक अभियान के तहत जैतपुर को जीत लिया था
- पेशवा बाजीराव प्रथम ने 23 जनवरी 1729 को देवगढ़ पर आक्रमण करके वहां के शासक चांद सुल्तान को पराजित कर दिया था।
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छत्रपति को रोकने के लिए मुगल सूबेदार बंगस मैं छत्रपति के खिलाफ एक अभियान प्रारंभ किया। छत्रपति ने मदद के लिए पेशवा बाजीराव को बुलाया जिसके परिणाम स्वरूप मुगलों के सूबेदार बंग्स को पराजय का सामना करना पड़ा इस युद्ध के बाद मुगल सूबेदार बंगस स्त्री का वेश धारण करके युद्ध क्षेत्र से भाग गया।
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पेशवा बाजीराव प्रथम में उत्तर मध्य भारत के क्षेत्र सागर और दमोह के लिए अपना प्रतिनिधि गोविंद खेर को चुना, गोविंद खेलने बालाजी गोविंद को अपना कार्यकारी बनाकर उन्हें जबलपुर में नियुक्त किया।
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छत्रसाल की मृत्यु 4 दिसंबर 1731 को हो गई उनकी मृत्यु के पश्चात मराठों ने उनके क्षेत्र को अपने अधिकार में ले लिया।
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चिमणा जी 11 नवंबर 1932 को बुंदेलखंड की ओर कुछ किया और अप्रैल 1733 तक वहां पर अपना पड़ाव डाल लिया।
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राष्ट्र के लिए लड़ने एवं मुगलों को देश से भगाने के लिए सैनिक सहायता हेतु मराठों ने नरवर दतिया ओरछा से चौथ वसूलने के लिए पीला जी जाधव को 28 दिसंबर 1733 के दिन ताप्ती नदी पार करा कर नरवर एवं ओरछा में उनके रहने की व्यवस्था की और उनके दल ने मदावर से ₹3 लाख इकट्ठा किए थे।
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मराठों की सेना ने 14 फरवरी 1935 के दिन मुगल सेना पर हमला कर दिया और मुगल सेना को चारों तरफ से घेर लिया जिसके पश्चात वजीर ने ओरछा के दुर्ग में बचने के लिए छिप गया।
- पीलाजी
की वीरता को देखकर छत्रपति बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने 17 नवंबर 1734 को
पोहरी हवेली जो कि शिवपुरी में स्थित है और नरवर का मोकासा पीला जी को
उपहार के रूप में प्रदान कियाबाजीराव पेशवा के नेतृत्व में मराठों ने 1737 में चंबल नदी को पार करके भदावर में आक्रमण कर दिया
1737 में पेशवा बाजीराव ने हैदराबाद के निजाम को भोपाल के युद्ध में नाको चने चबा कर पराजित कर दिया युद्ध के बाद निजाम और पेशवा बाजीराव के बीच संधि हुई इस संधि को दौरास राय संधि कहते हैं इस संधि में नर्मदा और चंबल के बीच की सभी क्षेत्र पर मराठों का अधिकार निजाम ने स्वीकार कर लिया
- 1740 के बाद आने वाले 20 वर्षों में मराठा शक्ति का विस्तार अटक से लेकर कटक तक हो गया था
- बाजीराव प्रथम अपने लाव लश्कर के साथ 7 मार्च 1740 को हंडिया और खरगोन पर आक्रमण करने के लिए प्रस्थान कर चुके थेबाजीराव 27 अप्रैल 1740 को बुखार से पीड़ित हो जाने के बाद रावेड़ खेड़ा में उनका देहांत हो गया था।
पेशवा बालाजी बाजीराव की गतिविधियां
पेशवा बालाजी बाजीराव 1 मार्च 1741 को पाटन से होते हुए ग्वालियर व भदवार पहुंचे तथा 6 जुलाई 1741 को पेशवा बालाजी बाजीराव को मालवा का नायाब सूबेदार नियुक्त किया गया।
- होलकर रियासत का उत्कर्षमल्हार राव होलकर का जन्म महाराष्ट्र के पुणे के पास होल नाम के स्थान पर हुआ था।
मल्हार राव होलकर के पिता के मृत्यु जल्दी हो जाने के वजह से मल्हार राव होलकर का पालन पोषण उनके मामा बारगव ने किया था
मल्हार राव होलकर मराठा सेना में 1718 में शिलेदार के रूप में भर्ती हुए थे
मल्हार राव होलकर को मालवा के 5 महलों का पहला उपहार 1727 में प्राप्त हुआ था यह उपहार मालवा फतेह के उपलक्ष में दी गई थी, जिसकी पुष्टि 16 सितंबर 1729 को की गई थी
बोलकर को मालवा का सर्वोच्च शासक 3 अक्टूबर 1730 को लेकर किया गया था।
बाजीराव पेशवा ने मालवा का शासन खोलकर और सिंधिया को 2 नवंबर 1731 को सौंप दिया था
- औपचारिक दस्तावेज के माध्यम से पेशवा
बाजीराव ने 29 जुलाई 17 32 में मालवा के जीते गए जिलों का विभाजन कर के
उन्हें होलकर सिंधिया और पवार सरदारों के बीच बांट दिया था
मालवा प्रदेश के इन बंटवारे में इंदौर देवालपुर और बेटमा सहित साढ़े 28 परगने शामिल थे।
बंटवारे के इस बंदोबस्त के द्वारा मालवा में मराठों की सत्ता की न्यू पड़ी जिसमें होलकर ने इंदौर पर राजवंश स्थापित किया सिंधिया ने ग्वालियर पर राजवंश स्थापित किया आनंद राव पवार ने धार में राजवंश की स्थापना की तुकोजी ने देवास की बड़ी पांती, तथा जीवाजी को देवास की छोटी पांति में राजवंश की स्थापना की हैं।
पानीपत की तीसरी लड़ाई जो कि 14 जनवरी 1761 में लड़ी गई थी इस लड़ाई के बाद मल्हार राव होलकर ने मालवा में अपना अधिकार करने के लिए फिर से इंदौर आए और एक बहुत बड़े क्षेत्र के अधिपति बन गए इस क्षेत्र की आय ₹60 लाख थी।
मल्हार राव होलकर की आकस्मिक मृत्यु 26 मई 1766 में आलमपुर में हुई थी तब उनके बाद उनका नाती मालेराव होलकर जो की खंडेराव का पुत्र था की पत्नी अहिल्याबाई ने पेशवा से अनुमति लेकर प्रशासन का कार्यभार संभाला।
अहिल्याबाई की 70 वर्ष की आयु में यानी 13 अगस्त 1795 को मृत्यु हो गई अहिल्या बाई की मृत्यु के बाद इंदौर का प्रशासन की जिम्मेदारी तुकोजी होलकर ने संभाली परंतु 2 वर्ष के बाद 15 अगस्त 1797 में उनकी भी मृत्यु हो गई
इसके बाद होलकर वंश के अन्य शासकों ने मल्हार राव होलकर के नाम पर इंदौर की शासन को संभाला यह शासक काशीराम यशवंतराव प्रथम तुलसा बाई आदि थे होलकर वंश के शासकों ने इंदौर में लगभग 200 वर्षों तक राज्य किया
मुगल वंश के अंतिम राजा तुकोजी तृतीया थे इन्हीं के समय में इंदौर राज्य को भारत संघ में मिलाकर मध्य भारत का अंग बना दिया गया था।

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